| Comprehension: | ||
| गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें। यायावर की याद में यायावरी का यह दर्शन जीवन को नए ढंग से समझने की माँग करता है कि रचनात्मकता के मूल में नया होने एवं नया करने की यही जिजीविषा आधार का काम करती है। कुछ नया करने, नया गढ़ने में बेलीक होना आवश्यक होता है। प्रकृति से बेलीक होकर ही तो सभ्यता का विकास प्रारंभ होता है। चाहें तो उन्मुक्तता कह लें, परंतु अनुसंधान एवं समाधान के मूल में उन्मुक्तता ही तो कारण रूप में होती है। बंधन में पिष्टपेषण होता है- सर्जना नहीं। सर्जन आनंदात्मक होता है और आनंद हमेशा नूतन-नवीन। मुक्ति की गूँज प्रकृति का सामान्य स्वर है। मुक्ति का नाद प्रकृति के पोर-पोर में गूँज रहा है। पर्वत, पहाड़, नदी, झरने से लेकर घास की नोंक तक सभी मुक्ति के आहवान हैं। चिड़ियों की मुस्कान, वृक्षों की झकाझोर झूम, झरनों की बहती, फलाँगती दौड़ सभी तो मुक्ति की इसी आदिम लालसा से स्वरित हैं। बारिश धूप किसका बंधन मानते हैं? कल एक चिड़िया देखी – झूल रही थी एक वृक्ष की छोटी, पतली टहनी को पकड़ कर बीच-बीच ये पंखों से हवा के थपेड़े दे रही थी – चिड़िया क्या, पूरा पेड़ झूम रहा था। तितली, भौंरे, टिड्डे जीव-जंतु इसी निर्बाधता के ही तो प्रत्यय हैं। कभी पढ़ा था बंधन मृत्यु है तो क्या मुक्ति जीवन नहीं। मुक्ति ही तो यायावरी है – मुक्ति का परम उत्सव। पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं । | ||
| SubQuestion No : 21 | ||
| Q.21 | उपरोक्त गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दें। बंधन में क्या संभव नहीं है? | |
| Ans | A. द्वेष | |
| B. उन्मुक्तता | ||
| C. सर्जना | ||
| D. संबंध | ||
Correct Ans Provided: C