| Comprehension: | ||
| दिए गए गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्न के उत्तर दीजिए- महाभारत में वर्णित विभिन्न प्रसंगों से स्प्ष्ट है कि उस युग में प्रणय के क्षेत्र में जाति, कुल, वर्ण और लोक-मर्यादा का विचार बहुत कुछ शिथिल हो गया था तथा सौंदर्य की प्रेरणा से ही प्रेम और विवाह सम्बंध स्थापित होने लगे थे। प्रेम और विवाह के क्षेत्र में आर्य-अनार्य का भेद भी लुप्त हो गया था। प्रणय-स्वप्नों की पूर्ति के लिए, नायिका का अपहरण व उसके संरक्षकों से युद्ध भी अनुचित नहीं माना जाता था। महाभारत के उपाख्यानों में नल-दमयंती महत्त्वपूर्ण है, जिसमें प्रेम की वे सभी प्रमुख प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं जो परवर्ती भारतीय प्रेमाख्यानों में भी बराबर प्रचलित रही हैं यथा—नायक-नायिका के अप्रत्यक्ष परिचय से प्रेम की उत्पत्ति, हंस के द्वारा संदेशों का आदान प्रदान, नायक-नायिका के मिलन में अनेक बाधाओं की उपस्थिति, परिस्थितिवश नायक-नायिका का विच्छेद एवं पुनर्मिलन। हरिवंश पुराण में कृष्ण-रुक्मिणी, और उषा-अनिरुद्ध के आख्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। प्रेमाख्यानों में अनेक कथा-रूढ़ियों का बारम्बार प्रयोग किया गया जैसे –नायिका का नाम वती वाला होना –पद्मावती, उसका जन्म दैवी अनुष्ठान से होना, उसका किसी द्वीप जैसे सिंहल , मलय आदि से संबंधित होना, स्वप्न-दर्शन, चित्र-दर्शन आदि के द्वारा प्रेमोत्पत्ति, नायक का छद्म वेश | ||
| SubQuestion No : 26 | ||
| Q.26 | जैन- कवियों ने प्रेमाख्यानक काव्यों में निम्न में से क्या परिवर्तन नहीं किया? | |
| Ans | 1. उन्होंने गद्य के स्थान पर दोहा-चौपाई से मिलती-जुलती पद्यात्मक शैली का प्रयोग किया। | |
| 2. उन्होंने नायक को सफलता जैन मुनि या व्रत उपवास आदि के माध्यम से दिलाई है। | ||
| 3. उन्होंने नायक–नायिका के मिलन में किसी भी प्रकार का अवरोध नहीं दिखाया। | ||
| 4. उन्होंने नायक-नायिका को कथांत में जैन धर्म में दीक्षित करते हुए संन्यासी होते दिखाया है। | ||
Correct Ans Provided: 3